डूबा डूबा सा मेरा शहर नजर आता हैं


फरीदाबाद।बी डी कौशिक मुख्य संपादक मातृभूमि संदेश न्यूज नेटवर्क।
आज सुबह अच्छी बरसात हुई,ठंडी ठंडी हवाओं का लुत्फ लेने के लिए हमने अपना वाहन निकाला और उस पर सवार होकर शहर का जायजा लेने निकल पड़े,घर से निकलते ही स्मार्ट सिटी की कीचड़ में फंस गये पटेल चौक एसजीएम नगर से बड़खल झील तक बनने वाले स्मार्टसिटी मार्ग के बीच में पानी भरा था और किनारे पर पड़ी मिट्टी दलदल बन चुकी थी इस मार्ग को बनते हुये तीन साल हो चुके हैं मगर स्थिति ज्यूं की त्यूं है जैसे तैसे वहां से निकले और सैक्टर 48 से हो लिये सोचा हुड्डा का सेक्टर है मगर यहां स्थिति पहले से भी बदतर थी सड़कों पर तीन तीन फुट पानी भरा था और उसमें कूड़ा तैर रहा था पैंट की मोहरी उपर को चढाई जैसे तैसे हमने बडखल गांव की तरफ से सैनिक कालोनी में प्रवेश किया। गुड़गांव से आने वाला मार्ग सड़क कम छोटी नदी ज्यादा नजर आ रहा था फिर हमने विचार किया
चलो सैनिक कालोनी में पूर्व मंत्री रहते हैं उनसे मिलकर इस विषय पर गुफ्तगू करेंगे। परंतु हमारे अरमानों पर पानी तब पड़ गया जब हमने सैनिक कालोनी डीएवी स्कूल से लेकर पूर्वमंत्री महेंद्र प्रताप के घर के सामने वाली सड़क को भी नदी का रुप धारण किए हुए पाया।
हमने सोचा कि चलो इसकी शिकायत फरीदाबाद के उपायुक्त महोदय से करते हैं सो हमने सेक्टर 12 स्थित सचिवालय की तरफ किया। वहां का तो नजारा देखते ही बनता था सचिवालय सेक्टर 12 के चारों तरफ की सड़कें और परिसर पानी में डूबा हुआ प्रतीत हो रहा था इसे देखकर हमारी हिम्मत जवाब दे गई।सो वापिस घर की तरफ रुख किया।सोचा वीआईपी एरिया से चलता हुं पानी में नहीं फसूंगा मगर ये हमारा मुगालता निकला और हमने देखा कि उपायुक्त महोदय के निवास स्थान के आसपास भी ये ही हाल था।
अब सवाल ये उठता है कि महज दो तीन घंटे की बारिश में फरीदाबाद तालाब का रुप क्यूं धारण कर लेता है अरबों रुपए खर्च करने के बाद भी स्थिति जस की तस क्यूं बनी हुई है
क्या उन जनप्रतिनिधियों को थोड़ी शर्म आती है जो अपनी पीठ थपथपाते नहीं थकते।भाजपा सरकार का आठवां साल सत्ता का जा रहा है और इतना समय किसी भी सरकार को मूलभूत सुविधाएं सुधारने के लिये बहुत होता है परंतु यहां तो सड़क,सीवर,पानी सबका बुरा हाल है और इन सबका कारण है भाई भतीजावाद और भ्रष्टाचार है इन कार्यों के ठेके जनप्रतिनिधियों ने अपने चहेतों और रिश्तेदारों को दे रखे हैं और निर्माण सामग्री की फैक्ट्रियां खुद लगा रखी है।आप खुद ही सोचिए जिस नगर निगम का 500 करोड़ रुपया बिना एक ईंट लगाये भ्रष्ट अधिकारियों, नेताओं,और ठेकेदार की भेंट चढ जाये उसकी स्थिति कैसे सुधर सकती है
अधिकारियों की लापरवाही से टनो गैलन बहुमूल्य पानी व्यर्थ ही नालों में बह जाता है जब कि वक्त का तकाजा तो ये कहता है कि इसकी बूंद बूंद जमीन के नीचे जानी चाहिए।
और इस मुहिम में स्थानीय प्रशासन, उद्योग पति,और स्वयं सेवी संस्थाएं महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
नहीं तो हर बरसात के बाद कहना पड़ेगा/ *डूबा डूबा सा मेरा शहर नजर आता है*