भारत का ताज बना अन्तर्राष्ट्रीय सूरजकुंड मेले का सिरमौर कश्मीर की खूबसूरती दिखाई दे रही है मेला परिसर में


सूरजकुंड, 25 मार्च।बी डी कौशिक मुख्य संपादक मातृभूमि संदेश न्यूज नेटवर्क। भारत के सिर का ताज, इस धरती की शान और देश का गौरव कहे जाने वाले जम्मू-कश्मीर ने 35 वें अंतर्राष्टï्रीय सूरजकुंड हस्तशिल्प मेले में अपनी समृद्घि लोक परंपराओं की बहार लाकर इस मेले को और भी खूबसूरत बना दिया है। खूबसूरती का अंदाज सीखना है तो हमें कश्मीर ही सिखा सकता है।


मेला के मुख्य द्वार के बाद थोड़ी ही दूरी पर हमे कश्मीर के दर्शन होने लगते हैं। यहां मुख्य सडक़ के दाईं ओर एक कश्मीरी वास्तुकला को दर्शाता मकान बनाया गया है। जिसमें हम मिट्टïी का लीपा हुआ चूल्हा, दस्तरखान, बिस्तर, पिंजराकारी, फर्श, भोजनशैली, वास्तुकला, बिछे हुए मसंद, पुराने बर्तनों को देखते हैं। इसी मकान के अंदर जीना लगाकर इसे दो मंजिला आकार दिया गया है। ऊपर भी आराम के लिए बिस्तर बिछाया गया है। मकान के साथ ही एंडवेंचर्स गेम्स का सामान, स्कीईंग, जूते, टेंट, रस्सी, हेलमेट आदि को दर्शाया गया है, ताकि लोग कश्मीर आएं और माऊंटेंरिंग खेलों का आनंद उठाएं।


मेला सडक़ के दाईं ओर कश्मीर की डल लेक में तैरता हुआ शिकारा अनुकृति के रूप में विद्यमान है। जो कि जम्मू कश्मीर के हस्तशिल्प व पर्यटन विभाग का कार्यालय भी है। इसी कार्यालय में मुलाकात होती है जेएंडके आर्ट एंड क्राफ्ट की चीफ डिजाईनर आमीना जी से। बेहद सुशिक्षित व विनम्र आमीना हस्त शिल्प की कला को सुंदर-सुंदर डिजाईन से सजाती हैं।एक सफल डिजाईनर होने के अलावा स्वभाव से बेहद सौम्य आमीना ने बताया कि पीएचडी चैंबर ऑफ कामर्स दिल्ली, हरियाणा पर्यटन विभाग, सूरजकुंड मेला प्राधिकरण और विशेष रूप से मेला अधिकारी राजेश जून की वो शुक्रगुजार हैं। जिन्होंने जम्मू-कश्मीर को मेले का स्टेट थीम तो बनाया ही, साथ में उनकी पूरी टीम को अपना सहयोग दिया है। वे और उनकी टीम के सदस्य यहां आकर प्रसन्न हैं व किसी प्रकार की तकलीफ नहीं है।
आमीना ने बताया कि इस मेले में कश्मीर के तीन द्वार बनाए गए हैं। इनमें पहले गेट का नाम मुबारक मंडी है। यह मूलत: जम्मू में है और डोगरा शासनकाल में इसे बनाया गया था। इसके बाद एक वाछा गेट है। वाछा श्रीनगर के समीप रैनावारी में है और इसे बादशाह अकबर ने बनवाया था। इसी प्रकार तीसरा चश्माशाही द्वार भी पर्यटकों को श्रीनगर की याद दिलाता है। जम्मू कश्मीर में शंकराचार्य के मंदिरों की प्रतिकृति भी यहां दर्शाई गई है। आमीना ने बताया कि भारत सरकार ने कश्मीर की पश्मीना शॉल को जीआई का टैग दिया है, जो कि अंतर्राष्टï्रीय स्तर पर मानक है। इस शॉल को बनाने में पूरी तरह से हाथ की कारीगरी की जाती है, कहीं भी मशीन का इस्तेमाल नहीं होता।
मेला परिसर की बड़ी चौपाल के समीप कश्मीर के कारीगर पर्यटकों के सामने ही अपने हाथ से कढ़ाई, कातने की कला का प्रदर्शन कर रहे हैं। उनके साथ आए मौहम्मद शोएब ने बताया कि जम्मू-कश्मीर से दो सौ शिल्पकारों, कलाकारों, कर्मचारी व अधिकारियों का दल आया है। इनके पास एक से बढकर एक कारीगरी के नमूने हैं। वर्ष 2000 के बाद यह दूसरा अवसर है, जब जम्मू-कश्मीर को मेले का सिरमौर राज्य बनाया गया है।